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कहानियाँ

स्वार्थ में परोपकार

लेखक: चन्दामामा | 4th Jul, 2011


 

धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पड़े के पास गया। पेड़ पर से शव को उतारा और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता गया। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन, इस भयंकर वातावरण की परवाह किये बिना अपने प्रयासों में मग्न हो। क्या कभी तुमने सोचा कि अब तक तुमसे किये गये सारे के सारे प्रयत्न क्यों निष्फल हुए? आश्र्चर्य तो इस बात का है कि एक बुद्धिमान व विवेकी राजा होते हुए भी अपनी असफलता के कारणों की जड़ में नहीं जा रहे हो।

मैं तुम्हारे हठ की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता, पर तुम्हारी मूर्खता पर भी मुझे दया आती है। कभी-कभी मुझे संदेह होने लगता है कि जो लगन तुम दिखा रहे हो, वह अपन स्वार्थ की पूर्ति के लिए है या परोपकार के उद्देश्य से।


 


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