धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया; पेड़ पर से शव को उतारा और यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘विषैले सर्पों, भूत-प्रेतों से भरे श्मशान में तुम निर्भय बढ़े जा रहे हो। मुझे तो लगता है कि भय भी तुमसे डरता है। किसी महान कार्य को साधने के लिए डटे हुए हो। तुम्हें अपने प्राण पर रत्ती भर भी मोह नहीं रहा। स्पष्ट है कि तुममें अटल आत्मविश्वास भरा हुआ है। तुम अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए, चाहे कोई भी मूल्य चुकाना क्यों न पड़े, चुकाने के लिए तैयार हो। आज तक मैं यह समझ नहीं पाया कि आख़िर वह लक्ष्य तुम्हारा है क्या? मुझे तुम्हारे श्रम को देखते हुए शशिकांत नामक एक ग्रामीण युवक की याद आती है, जिसने अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए अनेक कष्ट सहे, कठोर परिश्रम किया। उसकी कहानी थकावट दूर करते हुए मुझसे सुनो।'' फिर वेताल यों कहने लगाः |
|
|