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कहानियाँ

पिंजडे का तोता

लेखक: चन्दामामा | 24th Nov, 2008


रामचंद्र कृष्णापुर के ज़मींदार के दीवान में काम करता था। वह अपनी पत्नी जानकी और दोनों बच्चों के साथ सुखी जीवन बिता रहा था। बेटा मुरली ग्यारह साल का था तो बेटी लक्ष्मी दस साल की थी। रामचंद्र अपने बच्चों को बहुत चाहता था। काम से लौटते समय वह अवश्य ही उनके खाने के लिए मिठाइयाँ या गुडियाँ ले आया करता था।
 
एक दिन रामचंद्र परिवार सहित ससुराल गया। वहाँ हर साल एक बड़ा त्योहार मनाया जाता था, जिसमें भाग लेने वह वहाँ जाया करता था। मार्ग-मध्य में उन्होंने आम के एक बग़ीचे में आराम किया। तब उस बगीचे के पक्षी-समूह के कलरवों ने बच्चों को बहुत ही मुग्ध किया। उनकी चहचहाटें उन्हें बेहद पसंद आयीं। जब वे एक हाट में गये, तब मुरली ने एक तोता और ज्योतिषी को देखा। ज्योतिषी के कहने मात्र से वह तोता पिंजडे से बाहर आता था और एक पत्र उसके हाथ में थमा देता था। फिर उसके दिये बीजों को लेकर पिंजडे के अंदर चुपचाप चला जाता था। यह दृश्य मुरली को बहुत पसंद आया। उसने पिता से एक ऐसे ही तोते को खरीदने के लिए हठ किया।
 
‘‘देखो, तोता स्वतंत्र पक्षी है। ऐसे तोते को पिंजडे में बंद रखना ग़लत बात है। उसकी स्वतंत्रता को छीनना ठीक नहीं,'' पिता ने समझाने की बहुत कोशिश की। पर मुरली टस से मस न हुआ। उसका हठ जोर पकड़ता गया। घर लौटेने के बाद रामचंद्र एक तोता घर ले आया। उसे एक सुंदर पिंजडे में बंद रखा गया। मुरली दिन भर उसी के साथ खेलता रहता था।
 
एक दिन अचानक मुरली बीमार पड़ गया। तीन दिनों तक वह पलंग पर ही लेटा रहा। वैद्य ने आकर उसकी जांच भी की। वैद्यों ने उसकी जांच के बाद कहा, ‘‘यह एक प्रकार का विष ज्वर है। दवाइयाँ लेती रहनी होंगी और दो हफ्तों तक पलंग से उतरना तक नहीं चाहिये। अगर लापरवाही बरती गयी तो यह ज्वर और बढ़ेगा और अधिक दिनों तक लेटे ही रहना पड़ेगा।''
 

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