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कहानियाँ

विष्णु पुराण 20

लेखक: चन्दामामा | 18th Jun, 2010


 

मुनियों ने सूत महर्षि से पूछा, ‘‘मुनींद्र! हमने सुना है कि विष्णु अपने एक अन्य रूप कृष्ण की आकृति में गोलोक में वास करते हैं। हम उस कृष्ण के बारे में पूरा वृत्तान्त सुनना चाहते हैं।’’ इस पर सूत मुनि ने यों कहना प्रारम्भ किया-  सत्य लोक के ऊपर गोलोक है। वह सदा-सर्वदा अनेक नक्षत्रों के समूह के साथ ज्योत्सना से भरा रहता है।

 

विष्णु अत्यन्त गहरे नीले रंग के कृष्ण के नाम से वहॉं पर प्रवाहित होने वाली दिव्य नदी विरजा के तट पर तुलसी वन में मुरली बजाते दिव्य संगीत की रचना करते रहते हैं। उस मुरली के भीतर से ध्वनित होनेवाले नाद ने राधा की आकृति धारण की। राधा प्रकृति तथा कृष्ण पुरुष के रूप में एक दूसरे से कभी अलग न होने वाली जोड़ी के रूप में गोलोक में विहार किया करते हैं। सुदाम सदा-सर्वदा उनकी सेवा किया करता है।


राधा देवी के शरीर से असंख्य गोपिकाओं का उद्भव हुआ। विरजा नदी नारी रूप धारण कर वृन्दा देवी के रूप में प्रेम पूर्वक कृष्ण की आराधना किया करती है। एक बार राधा और कृष्ण परस्पर अनुराग में आबद्ध हो एकान्त में थे। उस वक्त कृष्ण की खोज में विरजा पहुँची। राधा ने उसको शाप दिया कि वह पृथ्वी पर जन्म ले। इस पर सुदाम ने आपत्ति उठा कर राधा से कहा कि इस प्रकार विरजा को शाप देना अनुचित है। इस पर राधा ने कुपित होकर सुदाम को भी शाप दे डाला, ‘‘तुम भी राक्षस होकर पृथ्वी पर जन्म धारण करो।’’ राधा के शाप के फल स्वरूप विरजा एक राजकुमारी तुलसी तथा वृन्दा के नामों से पैदा हुई।


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