बुद्ध के आगमन पर कपिलवस्तु नगर उनके स्वागत के हेतु बड़ी सुन्दरता से अलंकृत किया गया। नगरवासियों के भीतर अपूर्व आनन्द इस कारण उमड़ रहा था कि विश्व के लिये ज्योति बने भगवान बुद्ध उन्हीं के नगर के निवासी हैं। वास्तव में राजकुमार उनके शासक बनने वाले थे, पर वे समस्त विश्व की मानवता के चक्रवर्ती बन गये। इस बात पर गर्व करते हुए नगरवासियों ने उनके स्वागत के पथ पर फूल बिछाये।
अपने पुत्र का, वात्सल्यपूर्ण हृदय से आलिंगन करने के लिए वृद्ध महाराजा शुद्धोदन का हृदय उछलने लगा। पुत्र चाहे बड़ा हो गया हो, मगर इस समय मोह और प्रेम के वश होकर उनका हृदय उसे चुंबन लेने को चाह रहा था। नगर में बुद्ध का प्रवेश हो रहा था। अर्द्धनिमीलित नयनों से, गंभीर मुखमुद्रा के साथ, निश्चल शांत वदन लिये, करुणा की मूर्ति बन कर पधारनेवाले बुद्ध के पीछे असंख्य जनता ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’, ‘धम्मं शरणं गच्छामि’, ‘संघं शरणं गच्छामि’ के नारे लगाते उमड़ रही थी।
उधर राजमहल में यशोधरा, राहुल तथा महाराजा शुद्धोदन राजमहल की सीढ़ियों से उतर कर बुद्ध की प्रतीक्षा कर रहे थे। सारथी चेन्ना, जो सारथी के साथ-साथ राजकुमार का मित्र भी था, राजमहल के प्रांगण में आगे बढ़कर खड़े हो आनन्द के अश्रु बहाते हुए वहॉं खड़ा था । बुद्ध भिक्षा पात्र लिये राजमहल के सामने आये। राहुल ने दौड़ कर अपने पिताश्री के चरणों में प्रणाम किया। अनेक वर्षों के बाद दर्शन देने वाले अपने पतिदेव के प्रसन्न वदन को एकटक देखते हुए यशोधरा खड़ी रही, फिर उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम करके अपने मस्तक को उनके चरणों पर रख दिया । उसके नेत्रों के शुभ्र मौक्तिक अश्रुजल ने बुद्ध के चरणों को धो दिया।
|