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कहानियाँ

बालकांड - 4

लेखक: चन्दामामा | 22nd Jul, 2008


 
राम, लक्ष्मण को साथ लेकर, विश्वामित्र, ईशान्य दिशा की ओर गये। वे उस जगह पहुँचे जहाँ महाराजा जनक यज्ञ कर रहे थे। यज्ञशाला के चारों ओर ऋषियों के निवास थे। विश्वामित्र ने भी अपने लिए एक जगह रहने की व्यवस्था की। इस बीच महाराजा जनक को पता लगा कि विश्वामित्र आये हुए हैं।
 
वे अपने पुरोहित शतानन्द के साथ आये। उन्होंने अर्घ्य आदि से विश्वामित्र की पूजा की। महाराजा जनक ने विश्वामित्र से कहा कि उनका यज्ञ पूरा होने में अभी बारह दिन हैं। राम और लक्ष्मण को देखकर उन्होंने पूछा, ‘‘ये राजकुमार कौन हैं? किनके लड़के हैं?'' विश्वामित्र ने जनक से राम और लक्ष्मण का परिचय करवाया, ‘‘आपके पास जो धनुष है, उस पर बाण चढ़ाना सम्भव है कि नहीं, यह देखने के लिए मुख्यतः ये बच्चे यहाँ आये हैं।''
 
जनक का पुरोहित, शतानन्द, अहल्या और गौतम का बड़ा लड़का था। शतानन्द को यह जान बड़ी खुशी हुई कि राम के कारण उसकी माता शाप मुक्त हो गई है और उसके पिता, जिन्होंने उसको शाप दिया था, आश्रम में वापस आ गये हैं। उसने राम की ओर मुड़कर कहा, ‘‘आप विश्वामित्र का अनुग्रह प्राप्त करके धन्य हैं।
 
इस महापुरुष का जीवन वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनिये। वहाँ उपस्थित लोगों के समक्ष वह विश्वामित्र का जीवन वृत्तान्त यों सुनाने लगाः ब्रह्मा के कुश नाम का लड़का हुआ। उसके कुशनाभ नाम का पुत्र हुआ। कुशनाभ के लड़के गाधि के लड़के विश्वामित्र थे।

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