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कहानियाँ

अगम्य का महाकाव्य

लेखक: चन्दामामा | 22nd Nov, 2010


 दुष्टों को दंड देने और शिष्टों की रक्षा के लिए ही भगवान ने मानव का अवतार लिया और सामान्य मानव बनकर सब प्रकार के कष्टों को झेला। तुम जिन लोगों की बात कर रहे हो, उनकी कहानियों को अगर वाल्मीकि रचेंगे तो उनमें से हर कोई श्रीराम की तरह भगवान बनेगा।’’  पुरंदर की बातों ने अगम्य पर पर्याप्त प्रभाव डाला। उसका यह विश्वास पक्का हो गया कि श्रीराम की ही तरह मैं भी महान हूँ। इसलिए उसने कहा, ‘‘महोदय, मैं आपको अपनी कहानी सुनाउँगा। उसे आप रामायण जैसे महाकाव्य की तरह रचिये। मेरी भी प्रसिद्धि होगी और आपकी भी’’।


पुरंदर ने अविलंब कहा, ‘‘काव्य रचने की बात छोड़िये। पहले मैं आपके जीवन की विशेषताएँ सुनने के लिए बहुत ही उत्सुक हूँ।’’ फिर उन्होंने अगम्य की बतायी सारी बातें ध्यानपूर्वक सुनीं। इसके बाद पुरंदर को मालूम हो गया कि अगम्य नादान है। पर सच बताकर वह उसके मन को ठेस पहुँचाना नहीं चाहता था, इसलिए कहा, ‘‘अच्छा यही होगा कि तुम अपनी गाथा स्वयं काव्य के रूप में रचो। तब तुम श्रीराम से भी अधिक महान बन सकते हो, क्योंकि श्रीराम अपनी गाथा स्वयं लिख नहीं पाये’’।


अगम्य को, पुरंदर की ये बातें अच्छी लगीं। उसने सोचा, जब अशिक्षित वाल्मीकि महाकाव्य रच सकते हैं तो शिक्षित होकर मैं क्यों नहीं रच सकता? यों सोचते हुए उसने अपनी कथा को काव्य रूप देने का निश्र्चय किया। फिर उसने अपनी जीवन गाथा रची। जो लिखा, उसे दो-तीन बार पढ़ लिया। अपनी रचना-शक्ति पर उसे आश्र्चर्य होने लगा। पहले वह काव्य उसने अपनी धर्मपत्नी को सुनाया। अगम्य की पत्नी ने पूरा सुनने के बाद कहा, ‘‘मुझे क्यों सुनाने लगे? इसमें ऐसी कौन-सी बात है, जो मैं नहीं जानती।’’


‘‘रामायण में भी ऐसी कोई नयी बात नहीं है, जो तुम नहीं जानती। फिर भी बारंबार उसे क्यों सुनती रहती हो?’’ अगम्य ने पूछा। ‘‘राम की गाथा सुनने योग्य है। जो वह गाथा नहीं जानते, उन्हें अपनी यह गाथा सुनाइये ।’’ अगम्य की पत्नी ने रूखे स्वर में कहा।


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