युवराज म्यान से तलवार निकाल ही रहा था कि बाघ को देखकर घोड़ा घबरा गया। वह बेतहाशा पेड़ों के बीच में से तेज़ी से दौड़ता हुआ जाने लगा। बाघ उसका पीछा करने लगा। भील युवक ने यह दृश्य देखा तो तेज़ी से अपने घोड़े को उसने भी दौड़ाया और बाघ को अपना निशाना बनाकर भाला उसपर फेंका। भाला उसकी छाती में जा लगा। बाघ गरजता हुआ ज़मीन पर गिर गया और छटपटाने लगा। युवराज ने मुड़कर देखा तो उसे यह जानने में देर नहीं लगी कि क्या हुआ। उसने घोड़े को भील युवक के पास दौड़ाकर उससे कहा, ‘‘तुम घुड़सवारी में ही पटु नहीं हो बल्कि तुम यह भी अच्छी तरह से जानते हो कि किस समय पर क्या करना चाहिये। मेरी जान बचायी, इसके लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ।’’ यह कहानी सुनाने के बाद अध्यापक ने कहा, ‘‘देखा। अगर युवराज भील युवक से घुड़सवारी के कौशल सीखता तो बाघ का सामना करने में विफल नहीं होता। मानव आजीवन विद्यार्थी ही है। जिन बातों की जानकारी उसे नहीं है, उन्हें दूसरों से सीखने में आनाकानी नहीं करनी चाहिये। यह समझना नहीं चाहिये कि ऐसा करने से छोटा हो जाऊँगा। प्रतियोगिता की प्रवृत्ति होने पर ही विकास संभव है।’’ अध्यापक यह कहते हुए राम के मुख को भी देखते जा रहे थे। दूसरे दिन राम ने अध्यापक से कहा, ‘‘मेरे लिए भी एक विशेष परीक्षा चलाइये और मुझे भी अगली कक्षा में भर्ती कराइये। कृष्ण से होड़ लगाकर मैं पढूँगा।’’ राम में हुए परिवर्तन को देखकर अध्यापक बहुत खुश हुए। |