‘‘ऐसा ही करूँगा, पिताजी,’’ कहते हुए वह कृष्ण को अपने साथ कमरे में ले गया। भूपाल की पत्नी राजेश्वरी को अपने पति का यह काम अच्छा नहीं लगा। उसने कहा, ‘‘कितने अनाथों को हम शरण देते रहेंगे,’’ क्रोध-भरे स्वर में उसने कहा। ‘‘देखते हैं,’’ कहता हुआ भूपाल हँस पड़ा। घर के कामों में राजेश्वरी की मदद करते हुए कृष्ण, राम के साथ स्कूल जाने लगा। जब तक कृष्ण उसकी कक्षा में भर्ती नहीं हुआ, तब तक राम हर इम्तहान में अव्वल आता था। परंतु अब कृष्ण प्रथम स्थान में आता था तो राम द्वितीय स्थान में। भूपाल को यह जब मालूम हुआ तो उसने अपने बेटे राम से कहा, ‘‘कृष्ण तुमसे ज़्यादा अ़क्लमंद है। ज़रूरत पड़े तो उसकी मदद लो।’’ राम को पिता की ये बातें अच्छी नहीं लगीं;। लगा कि उसका अपमान किया गया। उसने मॉं से कहा, ‘‘मॉं, कृष्ण को घर से ही नहीं, स्कूल से भी निकलवा दो। तब मैं ही प्रथम आऊँगा।’’ राजेश्वरी भी अपने बेटे के स्वर में स्वर मिलाती हुई बोली, ‘‘पहले से ही मैं मना कर रही थी। तुम्हारे पिता तो मेरी परवाह ही नहीं करते।’’ फिर वह पेड़ के नीचे बैठे पढ़ रहे कृष्ण के पास गयी और बोली,‘‘देखो कृष्ण, आगे से प्रश्न-पत्र में से एक सवाल का जवाब मत देना।’’ ‘‘मॉंजी, मैं तो सब सवालों के जवाब जानता हूँ,’’ आश्चर्य से देखते हुए उसने कहा। ‘‘फिर भी हर इम्तहान में एक सवाल का जवाब तुम नहीं दोगे। यह मेरी आज्ञा है,’’ राजेश्वरी ने कटु स्वर में कहा। फिर इसके बाद राम ही को सब परीक्षाओं में प्रथम स्थान मिलने लगा। कृष्ण को द्वितीय । इस परिवर्तन ने अध्यापक को आश्चर्य में डाल दिया। कृष्ण से बार-बार पूछने पर उन्हें सच्चाई मालूम हुई। उन्होंने कृष्ण के लिए एक विशेष परीक्षा चलायी और उसे अगली कक्षा में भेज दिया। अपनी कक्षा से कृष्ण के चले जाने पर राम को बेहद खुशी हुई। अध्यापक के ज़रिये जब पूरा विषय भूपाल ने जाना तब उसने अध्यापक से कहा, ‘‘आपने ठीक ही किया। इससे कृष्ण के साथ न्याय हुआ है। पर इससे राम ही कोनुकसान पहुँचा है। राम को जानना चाहिये कि किसी से ईर्ष्या करना ग़लत है। उसे यह भी जानना चाहिये कि दूसरे से आगे बढ़ने के लिए प्रतियोगिता की प्रवृत्ति अवश्य होनी चाहिये। राम एक अच्छा बालक बने और उन्नति करे, इसकी जिम्मेदारी आप ही पर है।’’ |