चंदन की लकड़ी की महिमा के बारे में नारायण पांडे ने अपनी पत्नी लक्ष्मी को भी बताया। यह सुनते ही लक्ष्मी के मन में दुर्बुद्धि जगी कि उसका पति इस मंदिर का पुजारी बने। वह एक दवा जानती थी, जिसे खानेवाला एक महीने तक पलंग पर ही अस्वस्थ होकर लेटा रहेगा और फिर उसके बाद ठीक हो जायेगा। लक्ष्मी ने अपने ससुर को वह दवा खिलायी। माधव पांडे तुरंत अस्वस्थ हो गया और पलंग पर लेटा रहा। वैद्यों ने माधव पांडे की परीक्षा की और कहा, ‘‘यह बीमारी ख़तरनाक नहीं है, इसकी कोई दवा भी नहीं है। बस, पानी में भीगना मत।''
पिता के बीमार पड जाने के कारण नारायण पांडे मंदिर का पुजारी बन गया। इसी को मौक़ा समझकर लक्ष्मी ने पति से कहा, ‘‘अपनी वाक् शुद्धि का सबूत प्रजा को दो और उनकी प्रशंसा पाओ।''
पत्नी के कहे अनुसार नारायण पांडे ने पहले दिन मंदिर में आये लोगों से कहा, ‘‘मुझमें वाक् शुद्धि है। आपमें से जिन्हें जो माँगना है, माँगो।''
कुछ लोगों ने चाहा कि उनके व्यापार में वृद्धि हो, कुछ ने निधियाँ चाहीं। यों तरह-तरह की इच्छाएँ लोगों ने प्रकट कीं। वे सब फलीभूत हुईं। परंतु नारायण पांडे की पत्नी लक्ष्मी अकस्मात् पक्षाघात की शिकार हो गई। कारण जानने के लिए नारायण पांडे ने चंदन की लकड़ी हाथ में ली तो उसका सारा शरीर जलने लगा। वह बहुत ही परेशान हो उठा। ऐसे समय पर गाँव के सब लोग उसके पास आये और कहने लगे, ‘‘आपके पिता ने हम सबकी भलाई की। वे अब बहुत ही अस्वस्थ हैं। उनकी पीड़ा हमसे देखी नहीं जाती। हम चाहते हैं कि जब तक आपके पिता स्वस्थ न हो जाएँ तब तक हमारे गाँव में वर्षा न हो।''
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